समाज से ऊंचा है हमारा संविधान...
सजा देने के लिए कानून है ना...
मानते है समाजिक संगठन बना है इंसानों को, बुराईयों से बचाने के लिए।सूत्रों में बांधकर रखने के लिए।कोई किसी पर ज्यादती न करे इसलिए।कोई मनमौजी न हो जाए इसलिए।समाज बना है सबको समान अधिकार मिले इसलिए।समाज बना है मानव अधिकारों का हनन न हो जाए इसलिए।समाज बना है मानव के विकास के लिए।ना की समाज की आड़ में अपना दबदबा बनाने के लिए।समाज बना है मानव के विकास हो इसलिए अच्छे कार्य करने के लिए।मानवता बरकरार रखने के लिए।ना की मार पीटकर किसी को जलील करने के लिए।
शर्म तो तब आनी चाहिए जब समाज की आड़ में दंगे चल रहे हों।
शर्म तो तब आनी चाहिए जब दुकानों में खुलेआम नशा बिक रहा हो।शर्म तो तब आनी चाहिए जब वो समाज खुद ही ठेले में दारू बेचता और खरीदता हो। शर्म तो तब आनी चाहिए जब किसी को बेवजह आर्थिक रूप से दण्डित किया जा रहा हो। शर्म तो तब आनी चाहिए जब समाज की आड़ में बच्चों से नशा तस्करी कराया जाता हो।समाज के एक ही काम नहीं है साहिब अनेक रूप और किरदार हैं। बड़े आ जाते हैं न्याय करने खुद को न्यायमूर्ति समझकर जब सबको पता है विवाद का कारण शराब ही है तो फिर शराब बंदी के लिए आवाज उठाइए ना क्यों अपने आपको न्याय मूर्ति समझ लेते हो..?
लोगो को मारने के लिए अकेले ठेका दे रखे हो क्या समाज और गांव वालों से। खुद को समाज कहना सही नहीं साहिब समाज में असीम बल छुपा हुआ है। अकेले समाज नहीं हो तुम समाज कई ग्रामीनो का समूह होता है।
💐💐💐तख्त बदलेगा ताज बदलेगा दंगाइयों का हर राज बदलेगा💐💐💐


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