*सामाजिक बहिष्कार मामले में प्रताड़ित परिवारों के द्वारा प्रार्थना पर प्राथमिकी दर्ज नहीं करने वाले थाना प्रभारी के खिलाफ कार्रवाई हेतु, उच्च न्यायालय में लगायेंगे गुहार*
जरूरत पड़ने पर दंगे को बढ़ावा देने वाले,
न्यूज चैनलों पर भी रोक हेतु न्यायालय से रजिस्ट्रेशन रद्द के लिए किए जायेंगे,
RNI से निवेदन
स्वतंत्र समाचार स्वतंत्र विचार
*दैनिक हिंदी वेब मीडिया (छ.ग.)*
बालोद 20/03/2024
बालोद :– जिले के देवरी क्षेत्र में बसे ग्राम डूमरघूंचा में हुए सामाजिक बहिष्कार के बाद पीड़ित परिवारों को 2008 में भूमि अधिकृत किया गया था, उस पर बन रहे मकान पर ग्रामीणों ने अवैध कब्जा बताकर मकान निर्माण में रोक लगा दिया गया था। जिस पर पीड़ित परिवारों के द्वारा थाने में मामला दर्ज करवाना चाह था लेकिन मामले की प्राथमिकी रिपोर्ट ही दर्ज नहीं किया गया। अतः पीड़ित परिवार मामले को कोर्ट के माध्यम से f.i.r. दर्ज करवाना चाहा लेकिन अब तक मामले में पुख्ता सबूत नहीं होना बताकर खारिज कर दिया गया। जो जमीन अबतक भूमिहीन परिवार के अधिकार में होना चाहिए वह अभी किसी रसूखदार के कब्जे में हैं। अतः अधिकृत भूमि पर दूसरे सामाजिक कार्यकर्ता का कब्जा होना यह अनैतिकता है। इस पर अगर प्रशासन कार्रवाई नहीं करती तो मामले की कार्रवाई हेतु हाई कोर्ट से अपील स्वयं प्रार्थी द्वारा की जायेगी। पीड़ित परिवारों के साथ अन्य समाज से बहिस्कृत परिवारों के लोग हाई कोर्ट में लगायेंगे न्याय की गुहार।
साथ ही खबरों को भ्रामक तरीके से झूठ और नफरत फ़ैलाने वाले एवं भ्रामक कंटेंट दिखाने वाले समाचार संचालकों का रजिस्ट्रेशन रद्द करने की भी की जाएगी मांग।
ज्ञात हो की मामला 2008 का है, जहां राज्य सरकार के मंशा अनुरूप राज्य के सभी भूमिहीन गरीब परिवारों को 30x30=900 स्क्वायर फीट भूमि अधिकृत किया गया था। जिसका पट्टा राज्य सरकार के दवारा सभी गरीब भूमिहीन परिवारों को प्रदान कर दिया गया था।
ऐसे ही भूमिहीन परिवार डुमरघुंचा में निवासरत हैं जिनको पट्टा प्रदान किया गया है लेकिन दुर्भाग्य वश यहां की भूमिहीनो की भूमि पर ग्रामीण सामाजिक दलालों के द्वारा कब्जा कर लिए गए हैं।
इस पर पीड़ित परिवार के द्वारा प्राथमिकी दर्ज करना चाहा पर देवरी थाना प्रभारी नवीन बोरकर के द्वारा कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। जिसके चलते मामला कोर्ट में जाने से पहले ही तहसील से ही खारिज कर दिया गया था।
सामाजिक दलालों का कहना है की उपरोक्त भूमि पर प्रार्थी पक्ष के द्वारा अवैध कब्जा किया गया है अतः उपरोक्त आरोप निराधार है।
पट्टे की भूमि जो की प्रशासनिक अधिकारी के द्वारा नाप कर सीमा 900 s/f क्षेत्रफल आबंटित किया गया था।
ऐसे में अवैध कब्जा होने कि कोई सवाल ही नही उठता।
अनैतिक तरीके से संगठित होकर भूमि पर से मैटेरियल उठाकर बिना बताए ले जाना असंवैधानिक है।
इस पर कार्रवाई किया जाना उचित था। वीडियो फुटेज के रहते हुए भी मामला दर्ज ना करना अत्यंत शर्मनाक है। जोकि उपरोक्त कृत्य पुलिस प्रशासन की नाकामी को दर्शाता है।
साथ ही सामाजिक दल्लों ने आरोप प्रार्थी पक्ष पर धर्मांतरण का लगाया था जो की यह भी सिद्ध नहीं हो पाया।पार्थना सभा में जाने मात्र से कोई धर्मांतरित नही हो सकता।
और वैसे भी समान्यतया देखा जाए तो हमारा देश धर्म निरपेक्ष देश है, संविधान ने भारत के सभी नागरिकों को यह अधिकार दिया है की व्यक्ति किसी भी धर्म को मंशानुरूप मान सकते हैं। अतः उपरोक्त सभी नागरिकों को जो भारत के नागरिक हो मंशानुरूप किसी भी धर्म को मानने की स्वतंत्र है।
संविधान में उल्लेख स्वतंत्रता के अधिकार के तहत देखा जाए तो कोई भी नागरिक किसी भी धर्म को मानने की लिए स्वतंत्र हैं।
अतः धर्मांतरण का आरोप लगाकर अवैध कब्जा कर लेना असंवैधानिक है। और सुधिपाठक गनो को बता दूं कि
समाज से ऊंचा है हमारा संविधान
धर्मांतरण का आरोप लगाना राजनीतिक संगठनों एवं पार्टी प्रचारक का अच्छा तरीका हो सकता है।
धर्मांतरण हुआ है यह सिद्ध हुए बगैर किसी पे आरोप लगाना,
यह व्यक्ति के भावनाओं एवं मान सम्मान पर ठेस पहुंचाना है।
वेब मीडिया बालोद
(जो शांत हैं उसे शांत ही रहने दें,बोल पड़े तो आग उगलेंगे)
सच्चाई में वो ताकत है की कभी भी आग उगलता है।

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